Friday, 26 August 2016

विधर्भ का तुकाराम


 जश्न करना 
 नमकीन पानी का
 जो बहता है पूरे माह
 बंजर होते थार में
 थोड़ा तुलसी के जोरे का 
 माटी ही खिलाना 
 जिसको सींचा माँ ने
 नमकीन पानी में 
 मुझे धोना 
 नमकीन पानी में
 और मेरे नाक में 
 मत ठूसना रुई का फाहा 
 मुझे मत बनाना 
 वेरमुला 
 न मुद्दा किसी 
 मॉनसून सत्र का
 मुझे मत दफ़नाना 
 न जलाना
 लटकने देना 
 लाल कपड़े में 
 मुंह खुले
 की सोख लूँ
 सारी मनहूसियत
 सारा द्वेष 
 सारी पीड़ा
 श्राप किसान होने का 
 मैं विधर्भ का तुकाराम 
 देता हूँ एक और आहुति
 धरती को खुश करने के लिए
 कायर नहीं मैं
 सनक नहीं ये
 तुम्हारे सर्वे का विषय 
 भले मैं
 कुदाल मेरी 
 लोहे की रखना
 जंग न पड़े
 थोड़ा घिसते बस रहना!
 थोड़ा जौ और अक्षत 
 का टीका करना
 मेरे बंजर माटी में 
 मेरा तर्पण न करना....




  




  
                    





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