विधर्भ का तुकाराम
जश्न करना
नमकीन पानी का
जो बहता है पूरे माह
बंजर होते थार में
थोड़ा तुलसी के जोरे का
माटी ही खिलाना
जिसको सींचा माँ ने
नमकीन पानी में
मुझे धोना
नमकीन पानी में
और मेरे नाक में
मत ठूसना रुई का फाहा
मुझे मत बनाना
वेरमुला
न मुद्दा किसी
मॉनसून सत्र का
मुझे मत दफ़नाना
न जलाना
लटकने देना
लाल कपड़े में
मुंह खुले
की सोख लूँ
सारी मनहूसियत
सारा द्वेष
सारी पीड़ा
श्राप किसान होने का
मैं विधर्भ का तुकाराम
देता हूँ एक और आहुति
धरती को खुश करने के लिए
कायर नहीं मैं
सनक नहीं ये
तुम्हारे सर्वे का विषय
भले मैं
कुदाल मेरी
लोहे की रखना
जंग न पड़े
थोड़ा घिसते बस रहना!
थोड़ा जौ और अक्षत
का टीका करना
मेरे बंजर माटी में
मेरा तर्पण न करना....
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