मैं उठाऊंगा भार निरंतर
टीस और थकान में
कभी अपने माँ, बाप, बच्चे और बीवी
की तिरस्कृत लाश
को बांधकर फटी चादर में
जिसके छेद में से टपक जाती है
थकान गरीबी की
चादर जो सुखकर कठोर हो गई है अब
खून और पीप में मथकर
चरमराता नहीं तनिक भी
लाशों का भार ढोते- ढोते
मैं मरता हूँ रोज़
कभी विधर्भ में
कभी दन्तेवाड़ा में
महाराष्ट्र, आंध्र, बंगाल, पंजाब में
लटक जाता हूँ
कि भार हल्का हो
मेरे हिस्से के अनाज का
मैं घुटता हूँ रोज़
कि बह जाती है मेरी पौध
बाढ़ के कहर में
कभी तो इतना बहता हूँ मैं
कि समेट नहीं पाता दोनों हाथों से
कभी ऐसा सूख जाता हूँ
कि लार भी लटकी रह जाती है
जीभ पर
और मैं पसीने की बूँद में
समुन्द्र का खारा नमक ढूँढता हूँ
पर मिलती नहीं मुझे आग
न ही लाश जलाने को
न ही पेट काटने को
उठाए जाता हूँ
बोझ बना शरीर
क्योंकि उठा पाता हूँ
मैं !!
कभी बिल्डिंग की मोटी इंट
स्टेशन पर भीड़ की पीठ
लोगों के गुस्से की भड़ास
रोंधते हुए इरादों की उड़ान
पुलिस की ताबरतोड़ चलाई पेलेट गन का निशान
विस्फ़ोट का भर-भराया मलवा
गरीबी का घिसा मोटे चमरे का तलवा
शासन की लांछन
बुधिजिवियों के भाषण
कोमरेडों के वादों
और युवको के नारों का
भार !!!!